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टॉन्सिल वृद्धि (Tonsil Enlargement)

Tonsil Enlargement- Symptoms, Reasons, Causes

 

परिचय:-

इस रोग के कारण रोगी के गले की तुण्डिका बढ़ जाती है। वैसे यह कोई रोग नहीं है बल्कि यह कई प्रकार के रोगों के होने का लक्षण है। इस रोग को टॉन्सिल वृद्धि कहते हैं।

          टॉन्सिल एक प्रकार की ग्रन्थि है जो शरीर के निस्सरण संस्थान के बहुमूल्य अंग है। प्रकृति के अनुसार टॉन्सिल की रचना इस प्रकार की है जो शरीर को मल रहित बनाकर शुद्ध करता है। जब टॉन्सिल वृद्धि हो जाए उस समय टॉन्सिल को काटकर फेंक देना अच्छा नहीं होता बल्कि इसका प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना लाभदायक होता है।

टॉन्सिल वृद्धि होने का कारण:-

टॉन्सिलों के बढ़ने और फूलने का मुख्य कारण शरीर में विषैले पदार्थों का अधिक मात्रा में जमा हो जाना है। इसलिए इस रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले पेट को साफ करना आवश्यक है।

जब शरीर में दूषित द्रव्य जमा हो जाते हैं तो वह टॉन्सिल-वृद्धि, घेंघा, फोड़े-फुन्सी आदि कई रूपों में शरीर से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं जिससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक परेशानी होती है।

टॉन्सिल वृद्धि के और भी अन्य कारण हो सकते हैं जैसे- पानी में भीगना, अत्यधिक परिश्रम करना, बंद हवा में सांस लेना, समय-समय पर ठंड लग जाना तथा स्वरयन्त्र को सांस लेने के लिए अधिक काम में लेना आदि।

टॉन्सिल वृद्धि का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

जब तक टॉन्सिल का रोग कम न हो जाए तब तक 2-2 घण्टे के बाद केवल फलों का रस या शाक तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए तथा दिन में 3-4 बार फल भी खाने चाहिए और दूध पीना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में फल खाने चाहिए तथा दूध पीना चाहिए। रोगी को दोपहर को चोकर वाले आटे की रोटी, उबली सब्जी, मीठा दही या मट्ठा और सलाद तथा कच्ची साग-सब्जियों का सेवन करना चाहिए इसके बाद शाम को दूध पीना चाहिए तथा फलों का सेवन करना चाहिए।

जब तक यह रोग ठीक न हो जाए तब तक प्रतिदिन कम से कम 3-4 लीटर पानी पीना चाहिए।

इस रोग का उपचार करने के लिए जब तक फलों का रस पी रहे हो तब तक सुबह के समय में शौच करने के बाद अपने पेड़ू पर आधा घंटे तक गीली मिट्टी की पट्टी रखने के बाद डेढ़ लीटर गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए ताकि पेट साफ हो जाए। एनिमा क्रिया में जिस पानी का उपयोग कर रहे हो उस पानी में नींबू का रस मिलाना बहुत ही लाभदायक होता है।

इस रोग का उपचार कराते समय रोगी का वजन घट सकता है क्योंकि सामान्य भोजन न मिल पाने से वजन घट जाता है। लेकिन रोगी व्यक्ति को घबराना नहीं चाहिए क्योंकि जब रोग ठीक हो जाए तब रोगी व्यक्ति को उपयुक्त भोजन मिलने के कारण से उसका वजन सामान्य हो जाता है। रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन शाम के समय में भोजन करने के बाद और सोने से पहले अपनी कमर पर गीली पट्टी लगानी चाहिए। इस पट्टी को रातभर बंधे रहने देना चाहिए। रोगी व्यक्ति को सप्ताह में 1 दिन हाट एप्सम साल्टबाथ लेना भी आवश्यक है। जिस दिन इस पट्टी का प्रयोग कर रहे हो उस दिन कमर पर गीली पट्टी नहीं लगानी चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से टॉन्सिल वृद्धि रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

रोगी को दिन में कम से कम 2 बार टॉन्सिल, गला, हलक तथा गर्दन पर लगभग 10 मिनट के लिए भाप देनी चाहिए। उसके बाद गर्म पानी में नींबू का रस निचोड़कर उस पानी से कुल्ला करना चाहिए और इसके बाद लगभग 2 घण्टे तक अपने गले के चारों तरफ टॉन्सिल को ढकते हुए गीले कपड़े की लपेट या मिट्टी की पट्टी लगानी चाहिए। यह पट्टी रात को सोने के समय लगानी चाहिए तथा पूरी रात पट्टी को बांधे रखना चाहिए।

कागजी नींबू के रस तथा शहद को मिलाकर अंगुली से मुंह के अन्दर की तरफ टॉन्सिलों पर सुबह और शाम को लगाना चाहिए जिससे बहुत अधिक लाभ मिलता है। इस प्रकार से मालिश करते समय यदि रक्त या मवाद निकले तो निकलने देना चाहिए डरना नहीं चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने के बाद ताजे मक्खन को गर्दन पर लगभग 20 मिनट तक ऊपर की ओर मालिश भी करनी चाहिए। अन्दर की ओर मालिश करने के लिए कागजी नींबू के रस और शहद के स्थान पर साधारण नमक और गोबर की राख का भी उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इस रोग में नींबू का रस और शहद का उपयोग बहुत ज्यादा लाभकारी होता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सुबह के समय में अपने मुंह को खोलकर सूरज के सामने बैठना चाहिए और नीले शीशे के टुकड़े को अपने चेहरे के सामने इस प्रकार रखना चाहिए कि सूर्य की रोशनी इस शीशे से निकलकर टॉन्सिलों पर पड़े। इस प्रकार से उपचार कम से कम 7 मिनट तक करना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी को प्रतिदिन नीली बोतल के सूर्यतप्त जल को लगभग 25 मिलीलीटर लेकर की मात्रा में लेकर कम से कम 6 बार सेवन करना चाहिए तथा इसके साथ-साथ पीले रंग की बोतल के सूर्यतप्त जल को सेवन भी करना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को सादा और शुद्ध भोजन करना चाहिए तथा भोजन में दही, मट्ठा, ताजी साग-सब्जियों का प्रयोग करना चाहिए।  रोगी को मिर्च-मसाला, नमक, तेल, चीनी, चाय, कॉफी, पॉलिश, मैदा, अचार आदि का अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए।

टॉन्सिल वृद्धि से पीड़ित रोगी को कई प्रकार की दूसरी चीजों से परहेज करना चाहिए जो इस प्रकार हैं- नशीली चीजें, चावल, रबड़ी, गेहूं तथा तली-भुनी चीजें आदि।

टॉन्सिल वृद्धि से पीड़ित को अधिक बोलने से बचना चाहिए।

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