किन-किन कारणों से होता है वाइरल फीवर

वाइरल फीवर

virusसमस्त उत्तरी भारत इस समय ‘वाइरल फीवर’ की चपेट में है | कहीं डेंगू वाइरस से गर्दन तोड़ बुखार फैला है तो कहीं मोतीझरा (टाइफाइड) ने बुखार के साथ-साथ लाल-लाल दाने, पेट दर्द, पतले दस्त और हाथ-पांव में अकडन पैदा करके जान सांसत में डाल दी है | तीसरी आफत है वही मलेरिया, जिसमें वाइरस की बजाय प्लासमोडियम नामक मलेरिया परजीवी कंपकंपी के साथ एक दिन छोड़कर तेज बुखार, सिर-दर्द और बेहद कमजोरी पैदा करता है | मलेरिया-परजीवी एक किस्म का प्रोटोजोआ है – एक कोशिका वाला प्राणी | इसे अपना जीवन-चक्र पूरा करके के लिए मादा एलाफिलीज मच्छर और आदमी दोनों की देह में प्रवेश चाहिए | चौथी मुसीबत भी जानी-पहचानी है – फ्लू या इन्फ्लूएंजा | यह नाक, गले और फेफड़ों का दुश्मन है | इन सभी बरसाती बीमारियों में बुखार 104 डिग्री तक चाद्द जाना आम बात है | लापरवाही और कुपोषण से अगर मामला बिगड़ा नहीं है तो 5 से 7 दिन में इन विकारों से पिंड छुट जाता है | लेकिन तभी जब घर के सभी परानी एक-एक कर या एक साथ बिस्तर न पकड़ लें |

जिस वर्ग के विषाणु का हमला हुआ है, अगर उसी वर्ग के खिलाफ किसी खून के एंटीबॉडी मौजूद हैं तो वह बच जाएगा | हमारे घर में हमारा जवान बेटा जयपुर से लाया | उसनें अपनी मां और बहिन और साथ में ठहरे अपने मित्र में भी फ्लू का संक्रमण फैला दिया | गनीमत हुई कि मैं और हमारी सबसे छोटी बेटी बचे रहे | जाहिर है कि हम दोनों में फ्लू के ठीक उसी विषाणु के विरूद्ध एंटीबॉडी मौजूद थे, जिसने घर के बाकी प्राणियों को दबोच रखा था | एंटीबॉडी खून में विषाणु, जीवाणु और अन्य रोगाणु के विरुद्ध बन्ने वाली रक्षक प्रोटीन है, जो इन रोगाणुओं की प्रतिक्रियास्वरूप बनती है और इन बहरी घुसपैठियों का हमला होते ही उन पर झपटकर उनका काम तमाम कर देती है | यानि हमारी रक्षक और वाईरसों की भक्षक | फ्लू के वाइरस के विरुद्ध बी-लिम्फोसाइट नामक कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाती हैं, पर तभी जब हेल्पर टी-निम्फोसाइट कोशिकाएं दुश्मन की सही पहचान करा दें |

बड़ा अजीब सा जीव है वाइरस | बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ आदि सभी रोगाणुओं से छोटा भी और खोटा भी | फ्लू के विषाणु सहित करीब 300 किस्म के बैक्टीरिया और वाइरस हमारी श्वास प्रणाली पर हमला बोलते हैं | हर साल दुनिया भर में करीब २२ लाख लोगों को इनके संक्रमण से प्राण गवाने पड़ते हैं | इनमें सबसे शैतान है फ्लू का विषाणु, जो दुनिया भर की नाक में दम किए रहता है | फ्लू और जुकाम को चोली-दामन का साथ है |

फ्लू के विषाणु को तीन मुख्य विभेदों में बांटा गया है – ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ | इनके आगे और अपविभेद हैं | जैसे कि इन्फ्लूएंजा ‘ए’ के करीब 21 विभेद पहचाने गए हैं | सबसे खतरनाक भी यही है | रूस से चला और पुरे एशिया और फिर सारी दुनिया पर छा गया | ‘बी’ टाइप फ्लू भी महामारी फैलाए बिना चैन नहीं लेता | ‘सी’ टाइप यहाँ-वहाँ मामूली जुकाम देकर ही शांत हो जाता है | ‘ए’ टाइप आदमी के अलावा सूअर, घोड़े, जलजीव सील (ऊदबिलाव) और पक्षियों की स्वास प्रणाली पर भी हमला बोलता है | पहले पहल सन 1933 में विल्सन स्मिथ, क्रिस्टोफर और लेडला ने फ्लू का वाइरस फेरट नामक लघु आकर के स्तनधारी मांसाहारी प्राणियों से पृथक किया था | यों फ्लू पिछले चार सौ साल से नाक में दम करता रहा है | 1890 में फैला था हांगकांग ‘फ्लू’ |

यह वाइरस दुबारा 1968 में प्रकट हुआ | कुछ वैज्ञानिक इसे दूसरी किस्म का एशियन फ्लू वाइरस मानते हैं | यह सूअरों से फैला था और 1918 की महामारी में एक सौ रोगियों में से 3 की जान चली गई थी | दुनिया भर में करीब 2 करोड़ व्यक्तियों के प्राण लेकर ही थमी यह महामारी | 1957 में सिंगापूर से दूसरी किस्म का ‘ए’ टाइप फ्लु फैला | यह करीब 8 करोड़ बेमार हुए | तब तक दवाएं आ गई थी, सौ मौतें कम हुई | 1977 में रुसी वाइरस ने फ्लू फैलाया | दूसरों से उल्ट दबोचा भी, सिर्फ नौजवानों को जिन्हें 46-57 में फैला वाइरस की खुराक नहीं मिली थी |

बड़ी तेजी से फैलता है फ्लु | हर छींक वाइरस-बम का काम करती है | आपने घींका और अरबों विषाणु हवा में फ़ैल गए | हर विषाणु इतना छोटा कि एक पिन की घुडी पर एक लाख आराम से बैठ जाएं | हमारे चारों और हवा में फैले हुए हैं ये वाइरस | अनुकूल वातावरण मिलते ही दबोच लेंगे | इन्हें चाहिए सही नमी और गर्मी और एक निर्बल मानुष्य जिसका खून रोगाणु का हमला बर्दाशत न कर सके | इसीलिए झुग्गी-झोंपड़ी का कुपोषण ग्रस्त बच्चे, औरतों और बढ़े सबसे पहले शिकार होते हैं | हरी सब्जियाँ और फल देखते ही नाक-भौं सिकोड़ने वाले खाते-पीते घरों में भी वाइरस का स्वागत होता है | यों फ्लु का वाइरस दो दिन में ही देह के भीतर ‘पक जाता ’ है | 3-4 दिन तक बुखार तेज किए रहता है और उसके बाद बुखार उतरने लगता है | कमजोरी मरीज के सामान्य स्वास्थ्य के हिसाब से हफ्ते, दो हफ्ते तक चलती है | कई बार फ्लू के मारे मरीज पर दुसरे रोगाणु खासतौर से निमोनिया पैदा करने वाले बैक्टीरिया भी हमला बोल देते हैं |

असल में पिछले कुछ ऐसी सांठगांठ हो गई है कि इकट्ठे हमला बोलते हैं | इसके लिए पोषण विज्ञानी खानपान में आए बदलाव को दोषी मानते हैं | फास्ट फुडों ने परंपरागत पौष्टिक आहारों की जगह ले ली है | पेट तो भर जाता है इनसे-पर शरीर में को कोई ताकत नहीं मिलती | फिर प्रदुषण, गंदगी और भीड़भाड़ |

जहाँ तक दवा की बात है – पैटासिटामोल युक्त किसी भी ब्राण्ड वाली दवा और दर्द के लिए एसिपरीन युक्त कोई भी दवा छह-छह घंटे बाद ली जा सकती हैं | खतरनाक मामलों में हर रोज 200 मिलीग्राम अर्मेटाडिन हाईड्रोक्लोराइड दवा बताई गई है, जिसे भारतीय फार्माकोपिया में 1985 में शामिल किआ गया | यह अलग-अलग नामों से बिकती है |

लेकिन यह ‘ए’ टाइप फ्लु में ही कामयाब है, ‘बी’ में नहीं | दूरदर्शन पर और सब कुछ बताएंगे, पर दवाओं के नाम नहीं बताते | क्यों? कंपनी का मुफ्त में प्रचार हो जाएगा | स्वास्थ्य कार्यक्रम से पहले उसी कंपनी को प्रयोजन बना लो जिसकी दवा सबसे अच्छी है | दवा बताओगे नहीं और कहोगे खून की जांच करा लो और डाक्टर की सलाह लो | गोया हर नुक्कड़ पर मुफ्त में खून जांचने वाले और नब्ज थामने वाले बैठे हैं |

सरकारी अस्पतालों में तो भ्जीद ही इतनी कि मरीज को दिखाने गए स्वस्थ तीमरदार भी बीमार हो जाए | हर नुक्कड़ पर उलटी-सीधी डिग्रियां लिए खून चूसने वाले डॉक्टर बैठे हैं |
यों तो फ्लू के भी टीक बने हैं, पर फ्लू की किस्म का पता चले, तो सही टीका लगाया जाए | फिर कोई भी टीका जल्दी ही नाकाम हो जाता है | क्योंकि फ्लू का वाइरस बड़ा बहरूपिया है | यह अपना चोला बड़ी जल्दी बदलता है | चोला भी क्या है- बस चारों ओर किसी प्रोटीन या कुछ प्रोटीनों का आवरण और अंदर एकसूत्री आर. एन. ए. – यानी राइबोन्यूक्लिक एसिड | भारत में पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ वाईरोलोजी में 1976 से 86 के बीच 206 किस्म के फ्लू विषाणु इकट्ठे किए गए | पाश्चर इंस्टीट्यूट, कुनूर, हाफकिन इंस्टीट्यूट, बंबई और सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट, कसौली में भी फ्लू पर अनुसंधान होता है | वस्तुत: ये चारों संस्थान ‘फ्लू’ के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने संदर्भ केंद्र के रूप में चुने हैं | भारत का पहला हमला इस वाइरस ने 1781 मे, फिर 1889 में और फिर 1918 में किया था | बाद में 57,68 और 77 के हमले तो विश्वव्यापी थे | लंदन के पास सेलिसबरी में जुकाम की अनुसन्धानशाला करीब 60 साल तक कुछ भी नतीजा न निकलने के करंब बंद करनी पड़ी है | फ्लू के ही नहीं, सभी प्रकार के वाइरस चिकित्सा विज्ञान के सामने सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं | सभी वाइरस सजीव कोशिका से बाहर हैं, तो ऐसे रहेंगे मनो किसी जड़ रसायनिक पदार्थ के कण हैं | लेकिन संजीव कोशिका में प्रविष्ट होते ही चेतन हो जाते हैं और अपनी अनुकृतियां कहानी संताने पैदा करने लगते हैं |

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