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क्यों होता है भैंगापन? जानिए भैंगापन से बचने के उपचार

Category: Herbal Treatment And Health Written by Jaswinder Singh / December 23, 2016

भैंगापन से बचाव

जन्म के बाद कुछ समय तक शिशु की आँखें चीजों पर एकाग्र नहीं हो पाती | चार माह की उम्र तक वे छोटी-छोटी चीजों पर दोनों आखें टिकाने लगते हैं | छ: माह की उम्र तक के बच्चे में यह सामर्थ्य आ जानी चाहिए की वह दूर की चीजों पर लगातार और पास की चीजों पर थोड़ी देर के लिए आँखें टिका सकें |

भैंगापन उसे कहते हैं जब दोनों आखों में परस्पर तालमेल नहीं तो पाता | एक आँख या कभी-कभी दोनों आँखें अंदर की और देखती हैं या बाहर की और घूम जाती हैं या ऊपर-नीचे देखती हैं | यह स्थिति भी स्थायी हो सकती है या थोड़ी-थोड़ी देर के लिए भी | यह स्थिति जन्मजात भी होती है और बाद में भी बन सकते हैं | कई बार बीमारी या चोट की बजह से भी भैंगापन पैदा हो जाता है | यदि ऐसी स्थिति बच्चे में नजर आए तो तत्काल जांच करवानी चाहिए | छोटी उम्र में इसका सफल इलाज ज्यादा आसानी से संभव हो पाता है | जल्द जाँच हो जाने से अन्य कई व्याधियों से भी बचा जा सकता है |

क्यों होता है भैंगापन?

सामान्य तौर पर देखने की प्रक्रिया के दौरान किसी भी चीज से आने वाला प्रकाश आँख के लेंस पर पड़कर इस तरह मुड़ता हैं कि आँख के पर्दे (रेटिना) पर एक स्पष्ट छवि बनती है | स्पष्ट छवि के लिए एक जरूरी बात यह है किसी भी एक बिंदु से आने वाली प्रकाश की साड़ी किरणें रेटिना के एक ही बिंदु पर पहुंचे |

जब रेटिना पर यह छवि बन जाती है, तो रेटिना के पीछे उपस्थित तंत्रिकाएं यह संदेश दिमाग तक पहुंचती हैं | दोनों आखों में वास्तु की अलग-अलग छवि बनती है | दिमाग में इन दोनों छवियों को एक दुसरे पर आरोपित करके एक छवि बनाई जाती है | इस तरह हमारी आँखों दिव्नेत्री दृश्य प्रस्तुत करती हैं | दिव्नेत्री दृष्टि की बजह से ही हमें वस्तु की गहराई व् दुरी का अहसास होता है |

भैंगापन में दोनों आँखें एक ही चीज पर फोकस नहीं होतीं | जब दिमाग में इन छवियों को एक दुसरे पर आरोपित किया जाता है तो एक धुंधली सी छवि बनती है | तब दिमाग में एक अजीव सी कार्यवाही अपने आप होती है | दिमाग इन दो छवियों में से एक पर गौर करना बंद कर देता है | यदि वास्तव में एक ही आँख से बन्ने वाली छवि का इस्तेमाल होता है | दुसरे शब्दों में व्यावहारिक तौर पर एक आँख अक्रियाशील हो होता है | ऐसी स्थिति में जब एक ही आँख से छवि बने तब गहराई या दुरी का एहसास नहीं हो पाता |

तीन माह की उम्र तक बच्चे में किसी वस्तु पर फोकस करके स्पष्ट छवि बनाने की क्षमता नहीं होती | तब तक बच्चे की आँखें सिर्फ प्रकाश व् गति का एहसास कर पाती हैं | तीन माह के बाद ही धीरे-धीरे छवियों में भैंगापन आने लगता है | यह स्थिति भैंगापन में परिवर्तित हो सकती है |

उपचार

भैंगापन के उपचार का प्रमुख लक्ष्य यह होता है कि सामान्य दृष्टि भाल हो जाए और दोनों आँखों का परस्पर तालमेल हो सके | परस्पर तालमेल नहीं होने से दुरी व् गहराई का अहसास नहीं हो पाता | भैंगापन के उपचार हेतु चश्में, पट्टी, आँख की ड्रॉप्स, शल्य चकित्सा और आँखों के व्यायाम का सहारा लिया जाता है | इनमें से किसी बगही विधि का इस्तेमाल नेत्र चिकित्सक की सलाह से करना चाहिए | कौन-सी विधि इस्तेमाल हो यह तो भैंगापन के प्रकार व् उसके कारण पर निर्भर है |

चश्में की मदद से दूर-दृष्टि, निकट-दृष्टि या वक्र-दृष्टि (एस्टग्मेटिज्म) का उपचार किया जा सकता है | कई बार इतने ही भैंगेपन की सुधार हो जाता है | एस प्राय: एक वर्ष की उम्र के बाद जारी रखने वाली दिक्कतों में किया जाता है |

पट्टी लगाने का मतलब यह होता है कि स्वस्थ आँख पर कुछ अवधि के लिए एक पट्टी लगा दी जाती है | यह अवधि कुछ हफ्तों से लेकर एक साल तक की हो सकती है | पट्टी लगाना छोटी उम्र में ज्यादा कारगर होता है | अच्छी वाली आँख को तब तक ढक कर रखा जाता है जब तक कि तिरछी आँख सीधी न हो जाए | छ: माह के शिशु के मामले में यह अवधि मात्र 1-2 सप्ताह की होती है | बड़े बच्चों में ज्यादा समय लगता है | सात साल के बच्चे को तो एक साल तक पट्टी लगानी पड़ सकती है | छोटी उम्र्ण में ही ऐसे लक्षण को पहचानकर उपाय करना बेहतर रहता है | होता यह है कि जब स्वस्थ आँख को ढककर रखा जाता है, तो दूसरी आँख पर दबाव पड़ता है की वह सक्रिय हो | कई बार बच्चों में दो आँखों में एक ही चीज की दो अलग-अलग छवियां बनती हैं | इसे दूर करने के लिए भी पट्टी लगाने की सलाह दी जाती है | यदि साथ-साथ चश्मा भी जरूरी हो, तो पट्टी के ऊपर ही लगाया जा सकता है |

इसी काम के लिए आँख के मल्लम या ड्रॉप्स का इस्तेमाल भी किया जाता है | होता यह है कि इस मल्हम या ड्रॉप्स के द्वारा एक आँख की दृष्टि को अस्थाई रूप से धुंधला बना दिया जाता है | तब कमजोर वाली आँख सक्रिय होने को मजबूर हो जाती है |

यदि ये उपचार नाकाम रहे, तो कई बार शल्य क्रिया का सहारा भी लिया जाता है | यदि काम किसी प्रशिक्षत शल्य चिकित्स्य द्वारा किया जाता है | इसमें आँख की मान्पेशियों को दरुस्त करने का प्रयास होता है | यह ऑपरेशन काफी मामूली सा होता है | मांसपेशियों को इस ढंग से पुनव्यवस्थित किया कि आँखें ठीक जगह पर स्थित हो जाए | ऑपरेशन बड़ी उर्म में भी हो सकता है |

आखों के कई व्यायाम भी होते हैं, जिनसे मदद मिल सकती है | ये व्यायाम ऑपरेशन के पहले व् बाद में किए जा सकते हैं | इसके लिए किसी जानकार व्यक्ति से सलाह लेनी चाहिए | परन्तु आमतौर पर सिर्फ व्यायाम से पूरा आराम नहीं मिलता |

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