Herbal Treatment And Health

फोड़े-फुंसी और घमोरियों से बचने के लिए बदलिए अपने तौर-तरीकों को

Category: Herbal Treatment And Health Written by Jaswinder Singh / December 23, 2016

फोड़े-फुंसी और घमोरियों से बचाव

बरसात का मौसम | वर्षा हो तो गुलाबी सर्दी और कड़कड़ा कर धुप निकले तो उमस और गर्मी | इस माहौल ने जीना मुशिकल का रखा है | सारी देह चिपचिपा रही है | पसीना है कि रुकने का नाम नहीं लेता | घमोरियां हैं, जो शहद के छत्ते की तरह साड़ी पीठ और गर्दन पर छा गई हैं | जगह-बे-जगह उसे फोड़े और फुंसियों ने बेचैन कर रखा है |

पहले तो आप यह जान लीजिए कि घमोरियां क्यों और कैसे होती अतिरिक्त ताप को बहार निकाल, अंदर के ताप नियमित करता है | दुसरे, अंदर की गंदगी को बहार निकाल कर सफाई का काम करता है | पसीना जब त्वचा-रघ्र से बाहर आता है, तो हवा लगने पर वह सुख जाता है | पसीने का पानी भाप बनकर उड़ जाता है और अंदर की ली हुई गंदगी लवण के रूप में त्वचा-रंध्र पर धुल और कीटाणु आदि आकर चिपक जाते हैं, जो उसे बिलकुल बंद कर देते हैं | अत: पसीने के निकास का रास्ता बंद हो जाता है | पसीना चरों और फ़ैल जाता है | फटी हुई नलिकाएं और कीटाणु त्वचा को ला करके सुजन ला देते हैं | इससे त्वचा पर छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं | यही दाने घमौरी, अम्होरी या मरोड़ियाँ कहलाते हैं |

एक कारण एलर्जी भी है

घमोरियों के होने का एक कारन एलर्जी भी होता है | साबुन, पालिश, नायलॉन आदि सिथेंटिक कपडे, प्लास्टिक, तारपीन का तेल और घटिया किस्म के सौंदर्य प्रसाधन के दुष्प्रभावों से भी घमोरियां हो जाती हैं | घमोरियां अधिकतर पीठ, गर्दन, सीने और हाथों की कलाइयों से ऊपर की और होती हैं | बालों के अंदर ग्यास भी इसी का ही एक रुप है |

दरअसल, यह मौसम ही ऐसा है कि वातावरण की नमी और धुल-धक्कड़ में छिपे कीटाणु तवचा में घुस कर फोड़े-फुंसियाँ पैदा कर देते हैं | रक्त में विकार तो गर्मी की वजह होते ही है, ये कीटाणु उन्हें फोड़े-फुंसियाँ रक्त में विकार तो गर्मी की वजह होते ही हैं, ये कीटाणु उन्हें फोड़े-फुंसियाँ की शक्ल दे देते हैं | इसलिए सही मायने में यह मौसम खूब नहाने-धोने और शरीर को भली-भांति साफ़ रखने का है |

फोड़े-फुंसी और घमोरियों से बचने के लिए दिन में दो-तीन बात नहाना चाहिए और वह भी सही तरीके से | जितनी देर, अधिक से अधिक सम्भव हो सके, शरीर को पानी में भिगोय रखें | ऐसा करने से त्वचा-राध्रों द्वारा पानी अंदर जा कर अंदर की गर्मी को शांत कर रक्त-विकारों का परिहार करेगा | जब शरीर अच्छी तरह भीग जाए और मेल धुल जाए, तो उसे रगड़-रगड़ कर बिलकुल साफ़ कर दीजिए, जिससे त्वचा-रंध्र पूरी तरह खुल जाएँ |

बदलिए तौर-तरीकों को

ये त्वचा रोग पहनावे, वस्त्राभूषण, खान-पान, रहन-सहन और आवास की स्थिति पर भी बहुत निर्भर करते हैं | शरीर को साफ़ और शुद्ध हवा उचित मात्र में मिलती रहनी चाहिए | सुबह-शाम खुले में टहलने, रात में खुली छत पर सोने से तथा हलके सूती व् ढीले वस्त्रों के पहनने से इन रोगों से बचा जा सकता है | इस मौसम में पेट को साफ़ और पाचन क्रिया को ठीक रखना बहुत जरूरी है | भोजन हल्का और सहज रूप से पचने वाला होना चाहिए | भोजन में मौसमी फल और तकारियों को विशेष स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि इस मौसम की शाक-शब्जियों में रक्त-विकार शमन करने की अदभुत क्षमता पाई गई है | नमक और पानी का काफी मात्रा में उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि पसीने के रूप में ये दोनों ही बड़ी मात्रा में शरीर से निकलते हैं |

इन उपायों से फोड़े-फुंसी और घमौरियां से छुटकारा पाया जा सकता है | अगर इतने पर भी छुटकारा न मिले, तो गर्म पानी बोरिक पाउडर मिला कर सफाई और सिकाई करें | फोड़े और फुंसियों को कच्ची अवस्था में न फोड़ें, बल्कि उन्हें पकने दें | पकने पर उसकी पीप और कील निकाल कर अच्छी तरह सफाई करें | फिर मल्हम व् पट्टी बाँध कर उन्हें धुल-धक्कड़ व् कीटाणुओं से बचाएं |

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