Ayurveda

कुछ आयुर्वेदिक उपचार आपकी अच्छी सेहत के लिए।

Category: Ayurveda Ayurvedic Help Herbal Medicine Plants Written by Herbalogy / December 23, 2016

आयुर्वेदिक इलाज

मानव शरीर के भिभिन्न अवयवों में टांसिल्स का भी महत्वपूर्ण स्थान है | ये गले में श्वासनली और अन्ननली के साथ स्थित होते हैं | यह ग्रंन्थि मुँह में से होकर श्वासनली में प्रविष्ट होने वाले संक्रम्कों को रोकने का महत्वपूर्ण कार्य करती है | यधपि मानव शरीर में तीन प्रकार के टांसिल्स होते हैं | जजों तालू व् जीभ के अन्त में स्थित होते हैं लेकिन समान्यत: तालू के साथ स्थित ग्रन्थि को ही टांसिल्स कहा जाता है |

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टांसिल ग्रंथियां जन्म के समय बहुत छोटी होती हैं जो उम्र के साथ-साथ बढती रहती हैं | युवावस्था में न केवल इनका बढ़ना रुक जाता है अपितु धीरे-धीरे ये घटती जाकर अन्त में समाप्त हो जाती है |

अपनी प्रारंभिक वृद्धि अवस्था में टांसिल्स मुँह मार्ग से शरीर में प्रविष्ट होने वाले संक्रम्कों से शरीर की रक्षा कहते हैं, लेकिन जब ये अनावश्यक रूप से बढ़ जाते हैं तो श्वास लेने, बोलने और यहाँ तक की खाने-पीने में तकलीफ पैदा करने लगते हैं | इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में रोगी बार-बार गला सूखने तथा खराशने की तकलीफ भोगता है तो कभी-कभी हल्का बुखार भी महसूस होता है | छोटे बच्चों का पेट दर्द भी इसी के लक्षणों में आता है |

इनके आलावा सिर दर्द व् सारे शरीर में दर्द की अनुभूति भी इस रोग की विशेषता है | यह रोग बढ़ने पर बड़ा हानिकारक व् दूरगामी प्रभाव डालने वाला होता है | रोगी हर समय बदन दर्द महसूस करता है | बहुत तेज बुखार भी चढ़ सकता है | गले पर सुजन आ जाती है |

टांसिल के रोगी को खूब पानी पीना तथा आराम करना चाहिए | चिकित्सा में दवा से परहेज श्रेष्ठ वाली बात माननीय है | जिसको टांसिल ग्रन्थि बढ़ने का रोग है, यदि वे प्रतिदिन नियम से दो-तीन बार नमक मिले गुनगुने पानी से गरारे करें तो बड़ा आराम रहता है | टांसिल की यदाकदा शिकायत रहने पर बर्फ या फ्रिज के ठंडे पानी और मिठाइयों का सेवन करके के मामले में भी साबधानी बरतनी चाहिए | एन्टीबायोटिक दवाइयाँ रोग बड जाने पर ही लेनी ठीक रहती हैं | गर्म पानी या कपडे को गरम करके सेक करने तथा गले में मलकर लपेटने से भी राहत मिलती है |

यदि दवाओं से रोग नियंत्रण में न आए तो शल्य चिकित्सक से परामर्श लेना उचित रहता है | इसमें लापरवाही नहीं करनी चाहिए क्योंकि ज्यों-ज्यों रोग बढता है, त्यों-त्यों विषैले द्रव की मात्रा भी बढती जाती है जिससे गल एकी कुछ अन्य ग्रंथियां भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाती | ऐसे में संक्रामक रोग के जीवाणु शरीर में चले जाते हैं जिससे गले के साथ-साथ आँखें, नाक काम और गुर्दे तक प्रभावित होने का भय रहता है |

काफी दवा-परहेज के बाद भी स्थिति में सुधार न आए तो शल्य क्रिया करवा ही लेनी ही चाहिए | कुल मिलाकर यदि एक साल में तीन-चार बार इसका आक्रमण हो जाए या आखें, कान, नाक और गुर्दे आदि में संबन्धित बीमारियों के लक्षण प्रकट होने लगें तथा टांसिल इतने अधिक बढ़ जाएं कि बोलने व् खाने-पीने में ही दुविधा होने लगे तो शल्य-चिकित्सा अवश्य करवा लेनी चाहिए | टांसिल की शल्य-क्रिया बहुत लघु शल्य-क्रिया है | बहुत जल्दी रोगी की अस्पताल से छुटटी मिल जाती है | ऑपरेशन के बाद रोगी को कुछ दिन पूर्ण परहेज रखते हुए आराम करना चाहिए | नियमित रूप से गरारे करने पर गला साफ़ रहता है | अधिक बोलना नहीं चाहिए | कुछ दिन ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थ ग्रेहन करने चाहिए क्योंकि ठोस पदार्थो से अन्य रोगी का डर बना रहता है |

इस प्रकार सावधानी व् समझदारी से टांसिल के रोग से बहुत सरलता से मुक्ति पाई जा सकती है | वैसे तो यह रोग किसी भी औयु के स्त्री पुरुष को हो सकता है, लेकिन छोटे बच्चों में इसका अधिक डर रहता है |

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