Cause and Prevention

Uses of Natural Herbs for Skin Diseases- Herbal Treatments

Category: Cause and Prevention Herbal Treatment And Health Written by Jaswinder Singh / January 10, 2017

चर्म रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

आजकल बीमारियां काफी बढ़ रही हैं, उनमें चर्मरोग भी एक है | मानसिक उद्वेग, तनावपूर्ण जीवन, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, तथा निराशा भी इस रोग के कारन माने जाते हैं | 

प्राकृतिक चिकत्सा के अनुसार, चर्म रोगों के होने के कई कारण हैं जो इस प्रकार हैं –

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  • गलत, असंतुलित और अनियंत्रित भोजन | 
  • अस्वास्थ्यप्रद और तनावपूर्ण रहन-सहन |
  • पुराना, औषधीय उपचार |

चर्म रोगों के लिए हम कह सकते हैं कि वास्तव में ये सभी रोग शरीर से अवांछित पदार्थों को बाहर निकालने के प्रकृति के प्रयास हैं | इसे हम इस प्रकार ये समझ सकते हैं कि जब आंतें अपना काम ठीक ढंग से नहीं करती हैं तो शरीर के अवांछित पदार्थ भी उतनी तेजी से बहार नहीं निकल पाते, जितनी तेजी से कि जब आंतें अपना काम ठीक ढंग से नहीं करती हैं तो शरीर के अवांछित पदार्थ भी उतनी तेजी से बाहर नहीं निकल पाते, जितनी तेजी से कि उन्हें निकलना चाहिए | इससे रकत में टाक्सिन की मात्रा बढ़ जाती है और शरीर त्वचा की सहायता से स्वयं को ऐसे पदार्थों से मुक्त करने का प्रयास करने लगता है | इन्हीं प्रयासों हम चर्म रोगों का नाम देते हैं |

चर्म रोगों से पीड़ित रोगियों की परीक्षा से यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्षों तक अप्राकृतिक, अनुयुक्त और अति आहार लेने, नियमित व्यायाम न करने, तनावपूर्ण दिनचर्या रखने, पूरा आराम न करने, चाय, काफी, जैसी उत्तेजक चीजों का प्रयोग करने तथा औषधियों का प्रयोग करने से उत्पन्न हुई विषाक्तता का ही परिणाम चर्म रोग है |

सामान्यता ऐसा देखने में आता है कि चर्म रोग के साथ सिर दर्द, पेचिश तथा कब्ज आदि भी होते हैं | यहां यह जानना भी जरूरी है कि चर्मरोग स्थानीय नहीं होते बल्कि अन्य रोगों की भांति शरीर की भीतरी विषाक्तता को व्यक्त करते हैं |

प्राय: ऐसा देखने में आता है कि अधिकतर चिकित्सक चर्म रोगों के लिए हमारे रहन-सहन और आन्तरिक कारणों को उतरदायी नहीं मानते, इसलिए उनसे उपचार लेने के बाद भी रोगी को पर्याप्त लाभ नहीं मिलता है | उदाहरण के तौर पर हम मुहांसों को ही लेते हैं | यह पूरी तौर से कब्ज, गलत, असंतुलित पर अनियंत्रित भोजन से होता है | इसका चूर्ण उपचार केवल बाहरी मलहमों और लेपों से कर पाना सम्भव नहीं है | बीमारी शरीर की पूरी सफाई करने से ही ठीक हो सकती है और इस प्रक्रिया में सन्तुलित भोजन का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है |

प्राकृतिक चिकित्सालयों में चर्म रोगों के प्राय: ऐसे रोगी आते हैं जो बरसों तक अन्य इलाज ले चुके होते हैं तथा अन्तत: निराश हो जाते हैं | जो बरसों तक अन्य इलाज ले चुके होते हैं तथा अन्तत: निराश हो जाते हैं | उनको ऐसा लगता है उसका रोग अब जाने वाला नहीं | ऐसे रोगियों में दाद, खाज, खुजली, मुहाँसे तथा सोरियासिस के रोगी अधिक होते हैं | ऐसे रोगियों को प्राकृतिक उपचार से पर्याप्त लाभ मिलता है | चर्म रोगों के लिए प्राकृतिक उपचारों में मिटटी चिकित्सा महत्वपूर्ण है | पेट पर मिटटी की पट्टी तथा कब्ज न रहे, इसके लिए एनिमा का प्रयोग करते हैं | दाद होने की स्थिति में उस स्थान पर मिटटी का लेप करते हैं | यह लेप रोग की तीव्रता के अनुसार दिन में 2-3 बार भी किया जा सकता है | नीम के पत्तों को उबालकर उस पानी से दाद वाले स्थान को दिन में कई बार धोना चाहिए | नीम के पत्तों को उबालकर उस पानी से दाद वाले स्थान  को दिन में कई बार धोना चाहिए | दाद वाले स्थान को खुला रखकर उस पर धुप भी दिखानी चाहिए | 

कई बार चर्म रोग पुरे शरीर में फ़ैल जाता है | ऐसे रोगियों को स्वार्ग मिटटी का लेप दिया जाता है जिससे काफी लाभ मिलता है | रोगी के सिर से पैर तक पुरे शरीर में मिटटी लगा देते हैं | पौन घंटे बाद सूख जाने पर पानी की धार से नहला देते हैं | त्वचा की उत्तेजना एवं खुजली इससे काफी शान्त हो जाती है |

चर्म रोगों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण उपचार चादर स्थान है | गांधीजी ने अपनी पुस्तक ‘आरोग्य की कुंजी’ में लिखा है, “शरीर में घमौरी निकली हुई हो, पित्ती निकली हो, आमवात (अटोकेरिया) निकला हो, बहुत खुजली आती हो, खसरा या चेचक निकली हो तो भी यह चादर स्नान काम देता है |”

चर्म रोगों में सूर्य किरण चिकित्सा भी काफ लाभ पहुंचती है | सूर्य किरण चिकित्सा विशेषज्ञ डा. द्वारकानाथ नारंग ने अपनी पुस्तक में लिखा है, ” सभी चर्म रोगों में हरा पानी दिन में तीन बार और रात को सोते समय पीजिये | दाने-दाने निकल आएं या खाज सी चले तो नीला तेल लगाईए |”

इन सभी उपचारों के साथ-साथ रोगी के भोजन का भी विशेष ध्यान चाहिए | रोगी के लिए फलाहार, रसाहार एवं अंकुरित अन्न उत्तम खाद हो सप्ताह में एक दिन साधारण उपवास भी करना चाहिए | पेट साफ़ रहे, इसके लिए आवश्यकतानुसार एनिमा का प्रयोग करना चाहिए | सवेरे खुली हवा में टहलना, व्यायाम, योगासन तथा सूर्य नमस्कार का अभ्यास भी लाभप्रद है | रोगी का भोजन बिलकुल सात्विक हो | भोजन में मिर्च, मसाले, नमक, चीनी, चाय, काफी, चावल तथा खटाई का प्रयोग नहीं करना चाहिए | साथ ही अचार, चटनी, ठंडे पेय, बिस्कुट तथा आइसक्रीम का प्रयोग भी प्रतिबंधित रहना चाहिए |

रोग की उग्रता को देखते हुए रोगी चिकित्सक की देखरेख में लम्बा उपवास भी कर सकता है | उपवास के दिनों में उसे खूब पानी पीना चाहिए तथा आवश्यकतानुसार एनिमा लेते रहना चाहिए |

चर्म रोग से पूर्णतया मुक्त होने के लिए धुप और वायु का सेवन अति आवश्यक है | मिटटी का प्रयोग करते समय सावधानी बरतनी चाहिए | मिटटी साफ़-सुथरी और चिकनी हो, इसका विशेष ध्यान रहे | गंदे स्थान की मिटटी रोग को बढ़ा सकती है | अच्छा हो यदि हम इस मिटटी को प्रयोग में लाने से पूर्व धुप में अच्छी तरह सुखा लें | किसी चिकित्सक की सलाह से ही इन सब उपचारों को प्रयोग में लाना चाहिए |

कई बार ऐसा देखने में आता है कि चर्म रोग किसी औषधि द्वारा शरीर में दबा दिए जाने पर वह अधिक उग्रता से दमा, पाचन-तंत्र विकार तथा नेत्र रोगों के रूप में सामने आता है | ऐसी स्थिति में धैर्यपूर्वक प्रकृतिक चिकित्सा करने पर हम यथेष्ट लाभ ले सकते हैं |

एक सही जीवन पद्धति को अपना कर हम सभी बीमारियों से अपने को मुक्त रख सकते हैं | आज आवश्यकता इसी बात की है कि हम इस तथ्य को समझें तथा अपने शरीर को प्रयोगशाला न बनाकर नियमित दिनचर्या एवं सात्विक भोजन को अपनाएं |

 

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