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तीव्र तथा जीर्ण रोग (Acute and Chronic Disease) 

Acute Disease/Chronic Disease-Symptoms, Reasons, Causes

 

परिचय:-

 

सभी प्रकार के रोगों को दो भागों में बांटा जा सकता है

तीव्ररोग (तेज रोग)

जीर्णरोग (पुराने रोग)

तीव्ररोग

          वैसे देखा जाए तो तीव्र रोग हमारे मित्र हैं शत्रु नहीं क्योंकि इनसे शरीर की अन्दरूनी सफाई हो जाती है जो कि जीर्ण रोगों से हमें बचाती है।

तीव्र रोग होने के कारण

          यह रोग उन व्यक्तियों को होता है जिन व्यक्तियों के शरीर में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है और असाधारण ढंग से शरीर से बाहर निकलने लगता है।

तीव्र रोग होने के लक्षण

तीव्र रोग से पीड़ित रोगी को भूख नहीं लगती है और यदि लगती भी है तो बहुत ही कम।

तीव्र रोग से पीड़ित रोगी के मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है और रोगी व्यक्ति को कुछ भी चीज खानी में अच्छी नहीं लगती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी की जीभ गंदी रहती है।

तीव्र रोग से पीड़ित रोगी के मुंह में छाले हो जाते हैं।

इस रोग से पीड़ित रोगी का गला खराब रहता है तथा उसको बोलने में परेशानी होने लगती है।

तीव्र रोग से पीड़ित रोगी के सिर में दर्द होता रहता है।

तीव्र रोग निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

बुखार होना

उल्टी आना

खांसी हो जाना

जुकाम होना आदि कई प्रकार के रोग।

तीव्र रोगों का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार

तीव्र रोग से ग्रस्त रोगी को कुछ दिनों तक उपवास रखना चाहिए। इसके बाद रोगी व्यक्ति को एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए ताकि शरीर के अन्दर से दूषित द्रव्य बाहर निकल सकें।

इन रोगों को दवाइयों से दबाना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी व्यक्ति को दूसरे कई रोग भी हो सकते हैं।

जीर्ण  रोग (पुराने रोग)-

       जब दूषित द्रव्य शरीर के बाहर नहीं निकलता है तो वह शरीर के किसी भाग में जमा होता रहता है और जिस भाग में जमा होता है वहां पर कई प्रकार के रोग हो जाते हैं और रोग के अनुसार ही बीमारियों का नाम दे दिया जाता है जैसे- क्षय (टी.बी.), कैंसर आदि।

जीर्ण रोगों का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-

रोगी व्यक्ति को जीर्ण रोग होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए फिर इसके बाद इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करना चाहिए।

जीर्ण रोगों का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक लगातार फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद कुछ दिनों तक फलों का सेवन करते रहना चाहिए। रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट की सफाई करनी चाहिए ताकि शरीर की गंदगी बाहर निकल सके।

प्राकृतिक चिकित्सा से सभी प्रकार के जीर्ण रोग ठीक हो सकते हैं, लेकिन रोगी व्यक्ति को उपचार कराने के साथ-साथ कुछ खाने-पीने की चीजों का परहेज भी करना चाहिए तथा उपचार पर विश्वास रखना चाहिए तभी यह रोग ठीक हो सकता है।

तीव्र तथा जीर्ण रोगों का उपचार कराते समय रोगी व्यक्ति को कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए

 

रोगी व्यक्ति को कोई भी ठंडा उपचार करने से पहले अपनी हथेलियों को रगड़-रगड़ कर गर्म कर लेना चाहिए और फिर इसके बाद उपचार करना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को ठंडा उपचार करने के बाद खुली हवा में टहलकर या हल्का व्यायाम करके अपने शरीर को गर्म करना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को गर्म उपचार करने से पहले पानी पीना चाहिए और सिर पर गीला तौलिया रखना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को अधिक लाभ लेने के लिए कभी भी ज्यादा उपचार नहीं कराना चाहिए क्योंकि इससे व्यक्ति को हानि पहुंचती है।

जब रोगी व्यक्ति ठंडे पानी से उपचार कराता है तो उसे आधे घण्टे के बाद स्नान कर लेना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को भोजन करने के कम से कम ढाई घण्टे के बाद ही उपचार करना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को उपचार करने के बाद यदि कुछ खाना है तो उसे कम से कम आधा घण्टा रुककर ही उपचार करना चाहिए।

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