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बवासीर (Piles)

Piles – Symptoms, Reasons, Causes

 

परिचय:-

बवासीर के रोग का इलाज करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि इसके होने का क्या कारण होता है? तथा इसके लक्षण क्या है?

          वैसे प्राचीनकाल से ही देखा जाए तो सभ्यता के विकास के साथ-साथ बहुत सारे असाध्य रोग भी पैदा हुए हैं। इनमें से कुछ रोगों का इलाज तो आसान है लेकिन कुछ रोग ऐसे भी हैं जिनका इलाज बहुत मुश्किल से होता है। इन रोगों में से एक रोग बवासीर भी है। इस रोग को हेमोरहोयड्स भी कहते हैं। बवासीर को उर्दू में अर्श कहते हैं। यह रोग 2 प्रकार का होता है।

बवासीर 2 प्रकार की होती हैं। एक भीतरी बवासीर तथा दूसरी बाहरी बवासीर।

भीतरी बवासीर:-

           भीतरी बवासीर हमेशा धमनियों और शिराओं के समूह को प्रभावित करती है। फैले हुए रक्त को ले जाने वाली नसें जमा होकर रक्त की मात्रा के आधार पर फैलती हैं तथा सिकुड़ती है। इन भीतरी मस्सों से पीड़ित रोगी वहां खुजली और गर्मी की शिकायत करते हैं। यह बवासीर रोगी को तब होती है जब वह मलत्याग करते समय अधिक जोर लगाता है। बच्चे को जन्म देते समय यदि स्त्री अधिक जोर लगाती है तब भी उसे यह बवासीर हो जाती है। इस रोग से पीड़ित रोगी अधिकतर कब्ज से पीड़ित रहते हैं।

भीतरी बवासीर के लक्षण:-

इस बवासीर के कारण मलत्याग करते समय रोगी को बहुत तेज दर्द होता है।

इस बवासीर के कारण मस्सों से खून निकलने लगता है।

बाहरी बवासीर:-

          बाहरी बवासीर मलद्वार के बाहरी किनारे पर होती है। इस बवासीर के अनेक आकार होते हैं तथा इस बवासीर के मस्से एक या कई सारे हो सकते हैं। इस बवासीर के मस्सों के गुच्छे भी हो सकते हैं।

बाहरी बवासीर के लक्षण:-

          यह बवासीर तब होती है जब मलद्वार के पास की कोई नस फैल जाती है तथा फैलकर फट जाती है। फूली हुई नस के तंतु सूज जाते हैं। नस की कमजोर दीवारों से खून निकलकर जम जाता है तथा कठोर हो जाता है। रोगी को गुदा के पास दबाव और सूजन महसूस होती है और थोड़ी देर के लिए तेज दर्द होने लगता है।

दोनों प्रकार के बवासीर रोग के लक्षण निम्नलिखित हैं

अन्दरूनी बवासीर में गुदाद्वार के अन्दर सूजन हो जाती है तथा यह मलत्याग करते समय गुदाद्वार के बाहर आ जाती है और इसमें जलन तथा दर्द होने लगता है।

बाहरी बवासीर में गुदाद्वार के बाहर की ओर के मस्से मोटे-मोटे दानों जैसे हो जाते हैं। जिनमें से रक्त का स्राव और दर्द होता रहता है तथा जलन की अवस्था भी बनी रहती है।

इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को बैठने में परेशानी होने लगती है जिसके कारण से रोगी ठीक से बैठ नहीं पाता है।

बवासीर 2 प्रकार की होती है एक खूनी तथा दूसरी बिना खून की।

एक बवासीर में तो मस्सों में से खून निकलता है और यह खून निकलना तब और तेज हो जाता है जब रोगी व्यक्ति शौच करता है।

इस रोग के कारण व्यक्ति को मलत्याग करने में बहुत अधिक कष्टों का सामना करना पड़ता है।

दोनों प्रकार की बवासीर होने के कारण निम्नलिखित हैं

बवासीर रोग होने का मुख्य कारण पेट में कब्ज बनना है। 50 से भी अधिक प्रतिशत व्यक्तियों को यह रोग कब्ज के कारण ही होता है। इसलिए जरूरी है कि कब्ज होने को रोकने के उपायों को हमेशा अपने दिमाग में रखें।

कब्ज के कारण मलाशय की नसों के रक्त प्रवाह में बाधा पड़ती है जिसके कारण वहां की नसें कमजोर हो जाती हैं और आंतों के नीचे के हिस्से में भोजन के अवशोषित अंश अथवा मल के दबाव से वहां की धमनियां चपटी हो जाती हैं तथा झिल्लियां फैल जाती हैं। जिसके कारण व्यक्ति को बवासीर हो जाती है।

यह रोग व्यक्ति को तब भी हो सकता है जब वह शौच के वेग को किसी प्रकार से रोकता है।

भोजन में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होने के कारण बिना पचा हुआ भोजन मलाशय में इकट्ठा हो जाता है और निकलता नहीं है, जिसके कारण मलाशय की नसों पर दबाव पड़ने लगता है और व्यक्ति को बवासीर हो जाती है।

शौच करने के बाद मलद्वार को गर्म पानी से धोने से भी बवासीर रोग हो सकता है।

तेज मसालेदार, अति गरिष्ठ तथा उत्तेजक भोजन करने के कारण भी बवासीर रोग हो सकता है।

दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण भी यह रोग व्यक्ति को हो सकता है।

रात के समय में अधिक जगने के कारण भी व्यक्ति को बवासीर का रोग हो सकता है।

दोनों प्रकार की बवासीर रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार

बवासीर रोग का इलाज करने के लिए रोगी को सबसे पहले 2 दिन तक रसाहार चीजों का सेवन करके उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पके हुआ भोजन का सेवन करके उपवास रखना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को सुबह तथा शाम के समय में 2 भिगोई हुई अंजीर खानी चाहिए और इसका पानी पीना चाहिए। फिर इसके बाद त्रिफला का चूर्ण लेना चाहिए। ऐसा कुछ दिनों तक करने से रोगी का बवासीर रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

2 चम्मच काला तिल चबाकर ठंडे पानी के साथ प्रतिदिन सेवन करने से पुराना से पुराना बवासीर भी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

कुछ ही दिनों तक प्रतिदिन गुड़ में बेलगिरी मिलाकर खाने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है और बवासीर रोग ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी चाय, कॉफी, मिर्च मसाले आदि गर्म तथा उत्तेजक चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को रात को सोते समय प्रतिदिन गुदा के मस्सों पर सरसों का तेल लगाना चाहिए। फिर इसके बाद अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी करनी चाहिए और इसके बाद एनिमा लेना चाहिए तथा मस्सों पर मिट्टी का गोला रखना चाहिए।

यदि इस रोग से पीड़ित रोगी के मस्सों की सूजन बढ़ गई हो या फिर मस्सों से खून अधिक निकल रहा है तो मिट्टी की पट्टी को बर्फ से ठंडा करके फिर इसको मस्सों पर 10 मिनट तक रखकर इस पर गर्म सेंक देना चाहिए। इसके बाद इन पर मिट्टी की पट्टी रखने से कुछ ही दिनों में मस्से मुरझाकर नष्ट हो जाते हैं और उसका यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कटिस्नान तथा शाम के समय में मेहनस्नान करना चाहिए तथा इसके साथ-साथ प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार इलाज कराना चाहिए। जिसके परिणाम स्वरूप कुछ ही दिनों के बाद रोगी का बवासीर रोग ठीक हो जाता है।

दोनों प्रकार की बवासीर को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन है जिनको नियमपूर्वक करने से कुछ ही दिनों के बाद रोगी का रोग ठीक हो जाता है।

दोनों प्रकार के बवासीर रोग को ठीक करने के लिए कुछ उपयोगी आसन हैं जैसे- नाड़ीशोधन, कपालभांति, भुजंगासन, प्राणायाम, पवनमुक्तासन, शलभासन, सुप्तवज्रासन, धनुरासन, शवासन, सर्वांगासन, मत्स्यासन, हलासन, चक्रासन आदि।

रोगी के बवासीर रोग में होने वाले दर्द तथा जलन को कम करने के लिए वैसलीन में बराबर मात्रा में कपूर मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लगाने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

यदि बवासीर के रोगी के मस्सों से खून नहीं आ रहा हो तो उसे गरम पानी से कटिस्नान कराना चाहिए और यदि मस्सों से खून निकल रहा हो तो ठंडे पानी से कटिस्नान करना चाहिए। सुबह, शाम या फिर रात के समय में रोगी को ठंडे पानी से स्नान कराना चाहिए और फिर प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार उसका इलाज कराना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को कम से कम दिन में एक बार ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर लंगोट बांधनी चाहिए और फिर इस पर ठंडे पानी की फुहार देनी चाहिए और फिर प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार इलाज कराना चाहिए।

रात को 100 ग्राम किशमिश पानी में भिगो दें और इसे सुबह के समय में उसी पानी में मसल दें। इस पानी को रोजाना सेवन करने से कुछ ही दिनों में बवासीर रोग ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को रात को सोते समय केले खाने चाहिए इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है और धीरे-धीरे बवासीर रोग ठीक होने लगता है।

रोगी व्यक्ति को अपने भोजन में चुकन्दर, जिमीकन्द, फूल गोभी और हरी सब्जियों का बहुत अधिक उपयोग करना चाहिए।

दोनों प्रकार की बवासीर रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम को 1 गिलास मट्ठे में 1 चम्मच भुना जीरा पाउडर डालकर सेवन करना चाहिए।

आधा गिलास पानी में 1-1 चम्मच जीरा, सौंफ व धनिए के बीज डालकर उबालें । जब यह पानी उबलते-उबलते आधा रह जाए तो इसे छान लें। फिर इस मिश्रण में 1 चम्मच देशी घी मिलाएं और इसको प्रतिदिन 2 बार सेवन करें। इससे बवासीर रोग ठीक हो जाता है।

दोनों प्रकार के बवासीर रोग से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले इस रोग के होने के कारणों को खत्म करना चाहिए फिर इसका इलाज प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कराना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को यदि पेट में कब्ज बन रही हो तो इसका इलाज सही ढंग से कराना चाहिए क्योंकि बवासीर रोग होने का सबसे बड़ा कारण कब्ज होता है।

रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह-शाम 15 से 30 मिनट तक बवासीर के मस्सों पर भाप देनी चाहिए तथा इसके बाद कटिस्नान करना चाहिए इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में स्नान करना चाहिए जिससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है और इसके साथ-साथ प्राकृतिक नियमों का पालन करना चाहिए तभी यह रोग ठीक हो सकता है। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करने से कुछ ही दिनों में उसका बवासीर रोग ठीक हो जाता है।

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